किसी भी देश के विकस के
लिए औध्योगीकरण जरूरी हैं। उसके विना कोई देश तरक्की नहीं कर सकता परंतु जब यही
औध्योगीकरण निरंकुश हो जाता है तो समाज में तबाही का कारण भी बनता है। इसके घातक
परिणाम समाज और पर्यावरण को भुगतने पड़ते
हैं।
भारत के औध्योगीकरण ने भी यही किया है जीवन
के लिए जरूरी माने जाने वाले हवा और पानी को प्रदूषित कर दिया है। अभी हाल ही में
नीर फाउंडेसन दिल्ली की डबल्यूडबल्यूएफ़ संस्था ने काली नदी के पानी और काली नदी के
आशपाश के इलाके के पानी के सैम्पिलो का परीक्षण किया है जिसमें घातक तत्व सामने आए
है। काली नदी के किनारे बसे गाँव जलालपुर और काजी पुर से लिए गए नमूनो में आइरन,लेड,
हैवी मेटल्स मिले हैं। जल का पीएच मान मानक मान से अधिक और प्रतिवान्धित
पेस्टिसाइड्स भी मिले हैं। चिकिसको का कहना है कि ये तत्व इतने खतरनाक है कि काली
नदी का पानी संतानों को गर्भ में ही डसने लगा है।
काली नदी का पानी मानव और पशुओं के पेट में
पल रहे भ्रूणों के विकाश में बधा बन रहा है। काली नदी के किनारे के गवों में औरतों
में वांझपन कि समस्या तेजी से बढ़ रही है। महिलाओं का फर्टिलिटी रेट गिरा पाया गया
है।
बच्चों में मानसिक विकार,
विकाश में रुकावट, फेंफड़ों की बीमारी, कैंसर,
हड्डियों में कमजोरी पायी गयी है।
सब्जियों के सैंपलों में निम्नलिखित तत्व पाये गए-
बैंगन- BHC Alfa, हेप्टाक्लोर।
लौकी- हेप्टाक्लोर एपोक्साइड,BHC
डेल्टा।
मूली- BHC वीटा,
डेल्टा, हेप्टाक्लोर एपोक्साइड।
गाजर- BHC वीटा, हेप्टाक्लोर
एपोक्साइड।
दोस्तों ऊपर दिये गए तत्व
ऐसे है जिनके नियमित सेबन से इंसान बीमारियों की चपेट में आकर धीरे-धीरे म्रत्यु
को प्राप्त हो जाता है।
हमारी सरकारें विकाश के
नाम पर भोली भाली जनता के साथ खिलबाड़ कर रहीं हैं। उन मासूमों का क्या दोष जो अपनी
माताओं की कोख में पल रहे हैं। कुछ चंद लोगों के कर्मों की सजा हमारे मासूमों को
मिल रही है। अगर हमें अपनें
बच्चों को एक सुरक्षित भविष्य देना है इन सबके खिलाफ संगठित होकर आवाज उठानीं
होगी।